Tuesday, May 8, 2007

ज्योतिष प्रयोग भाग १


ज्योतिष के संबंध में मानसी जी के चिटठों को पढनें के बाद मुझे लगा कि जब तक उनका लिखना बंद है तब तक आप लोगों के लिए विषय से संबंधित जानकारी को आगे बढाया जाए यद्धपि मानसी जी के लेख व ज्ञान के सामने मेरा कोई अस्तित्व नही है फिर भी मैं प्रयास कर रहा हूं उन्होंने लिखना क्यों बंद कर दिया यह भी मेरे मन में एक बेहद जिज्ञासु प्रश्न है क्या लोग निरूत्साहित करते हैं इस विवादित विषय का जानकार होने का दावा करने पर खैर इसका उत्तर भी समय दे देगा अभी तो आपके लिए कुछ और जानकारी -


किसी भी जन्म पत्री का फलित या उसके संबंध में जानकारी प्राप्त करने विश्लेषण करने में बहुत सी बातों ज्योतिष के सिद्धांतों समयानुसार व अनुभव में प्राप्त ज्ञान अनुमान को ध्यान में रखा जाता है जिसको क्रमश: धीरे धीरे इस ज्ञान से परिचय होने पर व कुण्डली दर कुण्डली देखने भूत के घटनाओं को कुण्डली में खोजने से प्राप्त किया जा सकता है मैं स्वयं अभी इस विद्या का प्रशिच्छु हूं । हम यहां सामान्य रूप से आरंभिक तौर पर जन्म पत्री विश्लेषण के पूर्व जो मुख्य तत्व हमें ध्यान में रखने पडते हैं वे ये हैं -


१ भाव या धर - कुण्डली में १२ खाने होते हैं प्रत्येक खाने का ज्योतिष के अनुसार अलग अलग नाम है एवं इनका आपके व्यक्तित्व पर अलग अलग प्रभाव पडते हैं । पहला भाव या धर को लग्न कहा जाता है इससे आपके व्यक्तित्व, प्रकृति एवं संपूर्ण जीवन पद्धति के संबंध में जानकारी ली जाती है । दूसरा धर धन भाव कहलाता है इससे आपके जीवनकाल में प्राप्त होने वाले धन के संबंध में जानकारी ली जाती है । तीसरा धर को पराक्रम का भाव कहा जाता है इससे आपकी क्षमता ज्ञात की जाती है । चौथे धर को सुख भाव कहा जाता है इससे आपके जीवन में सुख व वैभव की जानकारी ली जाती है । पांचवे धर को पुत्र भाव कहा जाता है इससे आपके संतान के संबंध में विचार किया जाता है । छठे धर को शत्रु भाव कहा जाता है इससे आपके शत्रु, विरोधियों के संबंध में विचार किया जाता है । सातवां भाव पत्नी का भाव होता है इससे पत्नी के संबंध में विचार किया जाता है । आठवां भाव मृत्यु का भाव कहा जाता है इससे जातक की मृत्यु या जीवन के संबंध में विचार किया जाता है । नवम भाव को भाग्य भाव कहा जाता है इससे आपके भाग्य के संबंध में विचार किया जाता है । दसवा घर को कर्म एवं राज्य भाव कहा जाता है इससे आपके कार्यक्षेत्र के संबंध में विचार किया जाता है । ग्यारहवां घर को आय भाव कहा जाता है इससे आपके आय के संबंध में विचार किया जाता है । बारहवें घर को व्यय भाव कहा जाता है इससे आपके द्वारा किये जाने वाले खर्च के संबंध में विचार किया जाता है ।

हमने उपर जो भाव का नाम व संक्षिप्त विवरण दिया है वह आंशिक है ज्योतिष में इन बारह भावों के उपरोक्त लिखित क्षेत्र के अतिरिक्त अन्य विशद क्षेत्रों को भी समाहित किया गया है एवं कुछ मानसी जी के कथनानुसार यह व्यवहारिक रूप से कुण्डली के क्रमबद्ध अघ्ययन के बाद कौन सा विचार किस भाव से किया जाय यह स्वत: ही समझ में आ जाता है ।

२ भावों में स्थित राशि - यह जानकारी मानसी जी के द्वारा पूर्व में दी जा चुकी है जिस भाव में जो राशि होगा उस भाव में वह अपनी प्रकृति के अनुरूप प्रभाव डालेगा।

मेषो वृषश्च मिथुनः कर्क सिंहकुमारिकाः ।
तुलालिधनुषो नक्रकुम्भमीनास्ततः परम् ।।

३ भावों में बैठे ग्रह - यह जानकारी मानसी जी के द्वारा पूर्व में दी जा चुकी है जिस भाव में जो ग्रह होगा उस भाव में वह अपनी प्रकृति के अनुरूप प्रभाव डालेगा।



४ ग्रहों की दृष्टि - प्रत्येक ग्रह अपने स्थान से ९० अंश के कोण पर सीधी नजरों से देखता है । कुण्डली में ९० अंश का कोण या सीधी दृष्टि का मतलब है सातवां धर यानी सभी ग्रह अपने बैठे घर से सातवें घर को देखता है एवं कुछ ग्रहों के पास मान्यता के अनुसार अतिरिक्त दृष्टि भी होती है यथा -
मंगल चौथे व आठवें, गुरू पांचवें व नवें एवं शनि अपने स्थान से तीसरे व दसवें घर को भी पूर्ण प्रभाव से देखते हैं । जिस भाव में जो ग्रह अपनी दृष्टि डालेगा उस भाव में वह अपनी प्रकृति के अनुरूप प्रभाव भी डालेगा।


५ राशि स्वामी - वैदिक मान्यताओं के अनुसार प्रत्येक ग्रह किसी निश्चित तारामण्डल जिसे राशि कहा जाता है का स्वामी होता है और राशि स्वामी अपने स्थान का घ्यान अवश्य रखता है भले ही वह ग्रह गोचर के कारण दूसरी राशि में चले जाय यदि कुण्डली में ग्रह अपनी राशि में है तो वह उस भाव पर अपना शुभ प्रभाव डालेगा। राशियों के स्वामी इस प्रकार हैं -

१ मेष मंगल
२ वृष शुक्र
३ मिथुन बुध
४ कर्क चंद्र
५ सिंह सूर्य
६ कन्या बुध
७ तुला शुक्र
८ वृश्चिक मंगल
९ धनु गुरू
१० मकर शनि
११ कुंभ शनि
१२ मीन गुरू

६ ग्रहों की उच्चता व नीचता - उंच या नीच प्रभाव में भावों में स्थित ग्रह शुभ या अशुभ प्रभाव डालते हैं अर्थात यदि उच्च राशि का ग्रह धन भाव में हो तो धनागमन की संभावनाये हमेशा खुली रहती हैं इसी प्रकार यदि निम्न राशि का ग्रह धन भाव में हो तो धनागमन की संभावनाओं में विराम लग जाता है ।

सूर्य मेष १० उच्चांंश तुला १० नीचांश
चंद्र वृष ३ उच्चांंश वृश्चिक ३ नीचांश
मंगल मकर २८ उच्चांंश कर्क २८ नीचांश
बुध कन्या १५ उच्चांंश मीन १५ नीचांश
गुरू कर्क ५ उच्चांंश मकर ५ नीचांश
शुक्र मीन २७ उच्चांंश कन्या २७ नीचांश
शनि तुला २० उच्चांंश मेष २० नीचांश
राहु मिथुन १५ उच्चांंश धनु १५ नीचांश
केतु घनु १५ उच्चांंश मिथुन १५ नीचांश

७ ग्रहों के परस्पर व्यवहार - प्रत्येक ग्रह अपनी प्रकृति व वैदिक मान्यताओं के अनुसार एक दूसरे से मित्रवत, शत्रुवत एवं साम्य व्यवहार करते हैं हमें इनके परस्पर व्यवहारों को जानना होगा क्योंकि भावों में दो दो ग्रह एक साथ हो सकते हैं एक ग्रह पर दूसरे ग्रह की दृष्टि हो सकती है इन सबको देखते हुए हमें ग्रहों के बीच के संबंधों को जानना होगा -

क्रमश:

5 comments:

रामेन्द्र सिंह भदौरिया said...

ग्रहों के आपस के सम्बन्धों के प्रति बहुत ही मजेदार बात भारतीय ज्योतिष ने प्रदान की है,हर ग्रह जिन्दा है हर ग्रह देवता है और हर ग्रह हमेशा हमारे पास है,हर ग्रह आपस में हर काम कर रहा है,जैसे गुरु पिता है,चन्द्र माता है,मंगल भाई है,बुध बहिन बुआ बेटी है,शुक्र पति या पत्नी है,शनि घर का बुजुर्ग व्यक्ति है,राहु स्वसुर और केतु नाना है,यही ग्रह शरीर के अन्दर भी हैं जो हमेशा साथ रहते है,सूर्य शरीर और नाम,पहिचान आदि है,चन्द्र शरीर मे पानी की मात्रा है,मंगल शरीर में खून है,बुध शरीर में नसें और स्नायु तन्त्र है,गुरु दिमाग है,शुक्र जनन इन्द्रिय और शरीर की मोहक अदा है,शनि बाल,खाल और हर अंग की रक्षा करने वाला हिस्सा है,राहु विद्या है और केतु हाथ पैर कान,और शरीर को सहायता देने वाले हिस्से हैं,यही ग्रह हिन्दू मतानुसार पूजा में भी साथ रहते है,सूर्य विष्णु है,चन्द्र भगवान शिव हैं,मंगल हनुमानजी है,बुध दुर्गा जी है,गुरु भगवान इन्द्र है,ब्रह्माजी है,शुक्र लक्ष्मी है,शनि भैरों है,राहु सरस्वती है,और केतु गणेशजी है,पाराशरीय पद्धति और भारतीय वैदिक ज्योतिष में विषय की वृहदता के कारण पलीता (प्लूटो),हरक्षण (हर्षल),नापिच्युत (नेप्च्यून) का नाम किन्ही कारणों से नही जोडा गया है,इनके लिये जो शरीर और आत्मा आदि से सम्बन्ध आदि जो बताये गये है,उनके अन्दर प्लूटो को शरीर की संवेदनात्मक विद्युत ऊर्जा जिसके द्वारा दूर बैठे व्यक्ति की याद करते ही उसकी सम्बन्धित इन्द्रिय का फ़डकना,अपनी संवेदनाओं को दूसरों तक भेजना,किसी के मिलते आन्तरिक भाव नफ़रत या प्रेम का पनप जाना,यह सब प्लूटो से ही सम्भव है,हर्षल के द्वारा प्रतिक्षण मानसिक तरंगों का आते जाते रहना,जागने पर संसार केप्रति और सोने पर स्वप्नों आदि के द्वारा,जो संवेदनायें बनती बिगडती है,वे ही हर्षल हैं,आत्मा का निवास और आत्मा का रूप भी न+अप+च्युति कभी न समाप्त होने वाले अंश को नेप्च्यून का नाम दिया गया है,और जन्म के समय से लेकर मृत्यु तक आत्मा जिस कारण के लिये अपना प्रयास लगातार करती रहती है,वही आत्मा जो भी करने के लिये संसार में आयी होती है और अपना कार्य पूरा करते ही चली जाती है,का काम नेप्च्यून ले द्वारा देखा जाता है.

रामेन्द्र सिंह भदौरिया said...

ज्योतिष के लिये तीन कारण बहुत ही जरूरी है,जन्म,परण,और मरण,इन तीन कारणो को जानने के लिये ही संसार में प्राणी विभिन कारणों से अपने बुद्धि रूपी घोडे दौडाने का मार्ग खोजता रहता है,लेकिन वह हर कारण और कृत्य को साक्षात भी देखना चाहता है,साक्षात देखने के लिये जिस कारण को देखना है उसी के अनुरूप अपनी नजर बनाये बिना किसी तरह से नही देखा जा सकता,नजर यानी धारणा का प्रभाव ही उस क्षेत्र मे ले जाने के लिये सही मायनो में खरा उतरता है,किसान की मनसिक धारणा का प्रभाव उसके द्वारा किये जाने वाले खेती के काम तक ही सीमित होते है,उससे अगर एक दम पूंछा जाये कि सेटेलाइट क्या होती है,तो वह बिना जाने नही बता सकता है,लेकिन किसान को भी सेटेलाइट की जरूरत तो पडती ही है,उसके घर में जो टीवी चल रहा है,या उसके पास जो मोबाइल है,वह सेटेलाइट से तो ही सम्भव है,लेकिन अगर सीलाइट को बनाने वाले से पता किया जाये कि आलू को पैदा करने के लिये कैसी भूमि चाहिये,या आलू में कितने पानी और कब दिये जाते है,तो वह भी नही बता पायेगा,इसलिये जो लोग ज्योतिष को न जानकर केवल अखबारी राशिफ़ल पढकर ज्योतिष के बारे में अपनी महान राय प्रस्तुत कर देते है,अन्ध विश्वास और ढोंग धतूरा कहकर पिण्ड छुडाने की कोशिश करते है,उनको भी पता होना चाहिये कि जब से उन्होने जन्म लिया है,ज्योतिष उनके साथ भी चिपकी हुई है,स्कूल के सार्टीफ़िकेट में जो जन्म तारीख लिखी गयी होती है,सुबह जग कर आज कौन सा दिन है,का पता करना,माता का पिता के साथ आना और अपने नाम के साथ माता या पिता का नाम जोडना,शादी करना,पति और पत्नी का सम्बन्ध आदि क्या बिना ज्योतिष के संभव है,इसलिये विस्तारित दिमाग का प्रयोग करें,एक अंधे कुयें की दीवारों से सिर पटकने से अच्छा है कि ऊपर आकर पता करें कि संसार क्या है,केवल खाना,पीना मौज करना ही जीवन नही है,इस तरीक्से तो हम केवल दस प्रतिशत ही जाग पाते है,अपने को पूरी तरह से सौ प्रतिशत जगाने का प्रयास करना चाहिये.किसी भी जानकारी के लिये मुझे लिखे मै आपकी किसी भी राय का स्वागत करूंगा.astrobhadauria@gmail.com

Unknown said...

Very interesting blog.Thanks a lot..

संगीता पुरी said...

भारत के बहुत सारे लोगों को शायद इस बात का ज्ञान भी न हो कि विगत कुछ वर्षों में उनके अपने देश में ज्योतिष की एक नई शाखा का विकास हुआ है,जिसके द्वारा वैज्ञानिक ढंग से की जानेवाली सटीक तिथियुक्त भविष्यवाणी जिज्ञासु बुद्धिजीवियों के मध्य चर्चा का विषय बनी हुई है। सबसे पहले दिल्ली से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका ‘बाबाजी’ के 1994-1995-1996 के विभिन्न अंकों में तथा ज्योतिष धाम के कई अंकों में गत्यात्मक ज्योतिष के ज्योतिष के बुद्धिजीवी पाठकवर्ग के सम्मुख मेरे द्वारा ही रखा गया था ।
http://sangeetapuri.blogspot.in/2010/03/blog-post.html

Unknown said...

Sir please tell I will get government job name Seema dob 16/6/1988 time 11 am place hardoi up india